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  • सैर सपाटा

    पिछले महीने एक हफ्ते की छुट्टी मिली | मन में उमंगें और उत्साह लिए उछलते हुए निकल पड़े हम एक शहर की सैर पर | ट्रेन के सफर में हमारा अंतर्मन कुछ ज्यादा मजा लेता है तो हम छुक्छुकाने  लगे एक सुपरफास्ट एक्सप्रेस और उसमें बैठे कुछ सहयात्रियों के साथ | इधर ट्रेन ने प्लेटफार्म पर रेंगना शुरू किया उधर लोगों के खाने के डिब्बे खुलने लगे | इस.से पहले कि उन चटपटी चीजों कि खुशबू से मुहँ में बाढ़ आ जाए हम सरक लिए अपनी सीट पर | अपर बर्थ का यही फायदा है जब मन हो नीचे बैठो नही तो ऊपर जाकर अपनी सीट पर पसर जाओ | लोअर बर्थ वाले लोअर क्लास लोगों की तरह प्रताडित किए जाते हैं |

    कुछ घंटों बाद सोचा अपनी सीट पर बैठा जाए | सहयात्री अब भी तन्मयता से पगुराने में जुटे थे | माँ की सिखाई बातें दिमाग में आ रही थीं | हाथ खिड़की से बाहर मत निकालना, ट्रेन में खरीद कर कुछ मत खाना, किसी का दिया मत खाना | हाथ तो काबू में था लेकिन जबान …… तभी एक चने वाला आया, सब खाने लगे हम पहले ही अपने मन को बहुत मार चुके थे इस बार सोचा ‘महाजनः ये गतः सः पन्थः’ और हम भी स्वाद के पथ पर चल पड़े |

    चने स्वादिष्ट थे जब चने ख़त्म हुए तो हमारी नजर अखबार के उस टुकड़े पर छपी ख़बर पर पड़ी जिसमें हमने चने खाए थे | ख़बर थी ट्रेन में जहरखुरानी से चार की मौत | यह पढ़ हमारी शकल पर बारह बज रहे थे और घड़ी में छः | हमारी मंजिल आने वाली थी कि कुछ हिजड़े आ गए | कुछ लोगों ने उन्हें पैसे दिए तो कुछ ने बहाने | हम भी बहाना बनाते हुए बोले हम तो पढने लिखने वाले हैं तो वो बोले पढने लिखने वाले हो तो हमें भी प्यार वाली ट्यूशन पढ़ा दो न पप्पू |

    सफर के इन हिचकोलों में हमारे दिमाग की बत्ती बुझ चुकी थी, ट्रेन ने एक बार फिर रेंगना शुरू किया | ट्रेन के रुकते ही हम जल्दी से निकास के तीर देखते देखते स्टेशन से बाहर थे |  अब तक हमारे दिमाग की बत्ती गुल थी बाहर देखा तो शहर में भी बिजली रानी के नखरे चल रहे थे |

    इसको सताया उसको चिढाया
    इधर से गई उधर से निकली
    कोई न जाने कब आएगी बिजली

    हम स्टेशन से बाहर निकले उधर हमारा पर्स हमारी जेब से |  हमारे पर्स की हमसे ज्यादा जरूरत किसी और को थी इसीलिए शायद किसी ने … खैर बैग में पड़े कुछ पैसों से ऑटो वाले को पैसे दे पहुचे हम एक होटल | वहाँ एक कमरा लिया और चौड़े हो गए |

    सुबह उठकर हम सैर पर निकल पड़े | सड़क पर खुले मेनहोल और गड्ढे बांह पसारे मुस्कुराते हुए हमें अपने पास बुला रहे थे | अद्भुत चमक थी उनकी आंखों में | हम सोचने लगे

    तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
    रोज कितनों को गिरा रहे हो |

    फिर जब प्यास लगी तो देखा

    कहीं कहीं इक्के दुक्के नल लोगों को पानी पिला रहे थे
    बाकी ज्यादातर खुलते ही आशिक बन सीटी बजा रहे थे |

    प्रदूषण पर दसंवी कक्षा में निबंध लिखने को आया था | तब तो हम गच्चा खा गए थे आज कोई लिखने को कहता तो ऐसा चित्र खीचते कि.. प्रदूषण के साक्षात दर्शन हो रहे थे | वहीँ आगे धुएँ के गुबार के बीच पुलिस वाले भइया ट्रक वालों को रोक कर न जाने क्या थोडी बातें करते फिर एक हाँथ जेब में जाता दूसरे से आगे बढ़ने का इशारा किया जाता | यह नुक्कड़ नाटक लगभग सभी चौराहों पर खेला जा रहा था |

    यह सब देख हमें सैर का जो शौक चर्राया था वो अब चरमरा चुका था | खैर लौटकर हमने अपना यात्रा वृतांत देश के विभिन्न शहरों में रह रहे अपने मित्रों को लिख भेजा |  सभी से नाराजगी भरे पत्र आए |
    सबने लिखा अच्छी दोस्ती निभायी हमारे शहर में आकर चले गए और हमें ख़बर भी नहीं की |

    बिहार में प्रलय

     
    बचपन में माँ से था सुना जल देव हैं जीवन आधार
    जल ही जल बस जल ही जल हर तरफ़ चीख बिलख हाहाकार   
    उजड़ने बहने का मौसम वीभत्स है डरावना है
    कोसी के इस अभिशाप को इस कहर को मिल थामना है
    खोयी हँसी खोयी खुशी सब खो गयीं बातें वहां
    बह गए हैं घर बहुत अब बह रहीं आँखें वहां

     

    कुछ घाव हैं ऐसे मिले जिनका निशां न मिट सकेगा
    पैसा मिलेगा घर बनेगा अपने जो बिछडे कौन देगा 
    बूढे कुछ बच्चे बहुत लड़ न सके इस प्रलय से
    है जिंदगी की ज़ंग ये लड़नी हमें निष्ठुर समय से
    खोयी हँसी खोयी खुशी सब खो गयीं बातें वहां
    बह गए हैं घर बहुत अब बह रहीं आँखें वहां

     

    अपनों को खोने की कसक मन में लिए वो जी रहे
    खून के कुछ घूँट और आंसू बहुत हैं पी रहे
    ठिठुरते ताकें वहां वो भाई अपने अभागे मदद को
    बस हाथ कुछ हैं चाहिए जो आ सकें आगे मदद को
    खोयी हँसी खोयी खुशी सब खो गयीं बातें वहां
    बह गए हैं घर बहुत अब बह रहीं आँखें वहां

    ‘महावीर’ ब्लॉग पर मुशायरा

    सूचना

    महावीरब्लॉग पर मुशायरा (कवि-सम्मेलन)

    “बरखा-बहार”

    वरिष्ठ लेखक, समीक्षक, ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की प्रेरणा से जुलाई १५, २००८ एवं जुलाई २२,२००८ को इस ब्लॉग पर मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है।
    इस ब्लाग पर मुशायरे में शिरकत के लिए कवियों की बड़ी तादाद होने की वजह से मुशायरे को दो भागों में दिया जा रहा है। पहला भाग १५ जुलाई और दूसरा भाग २२ जुलाई २००८ को दिया जायेगा।

    देश-वदेश से शायरों और कवियों में प्राण शर्मा, लावण्या शाह, तेजेन्द्र शर्मा, देवमणि पांडेय, राकेश खण्डेलवाल, सुरेश चन्द्र “शौक़”,कवि कुलवंत सिंह, समीर लाल “समीर”,नीरज गोस्वामी, चाँद शुक्ला “हदियाबादी”,देवी नागरानी, रंजना भाटिया, डॉ. मंजुलता, कंचन चौहान,डॉ. महक, रज़िया अकबरमिर्ज़ा, हेमज्योत्सना “दीप”, नीरज त्रिपाठी आदि पधार रहे हैं।

    आप से निवेदन है कि उनकी रचनाओं का रसास्वादन करते हुए ज़ोरदार तालियों (टिप्पणियों) से मुशायरे की शान बढ़ाएं।
    महावीर शर्मा
    प्राण शर्मा
    पत्र-व्यवहार इस ईमेल पर कीजिए :
    mahavirpsharma@yahoo.co.uk
    महावीर‘ – http://mahavir.wordpress.com

    *****************

    हम आप और अपनापन

    बहुत दिनों से सोच रहा था कि ब्लॉग पर कुछ ऐसा लिखूं जिसे पढ़कर पाठक कुछ अपनापन महसूस करें |

    किसी चीज में भी कोई तब ज्यादा आनंद पाता है जब उसे अपने से जोड़ पाये | सोचा दो मूर्खों की कहानी लिखता हूँ , समझ लीजिये पहला मैं और दूसरे …. | लेकिन फिर सोचा कि सब लोग तो मूर्ख नही होते और होते भी हैं तो मानते नहीं | मुझसे भी लोगों ने कई बार बोला कि ये क्या मूर्खता है आपसे भी बोला होगा , हो सकता है कुछ अधिक बार , ये सब तो चलता रहता है |

    खैर कुछ प्रयास किया है आपसे और जुड़ने का , आपके बारे में और जानने का |

    पहले एक कहानी

    गाँव में एक धोबी था उस के पास एक कुत्ता था और एक गधा था। धोबी उन दोनों से बहुत काम लेता

    था, मारता, पीटता था , खाना भी कम देता था

    एक दिन धोबी अपनें परिवार के साथ शहर गया घर में कुत्ता और गधा अकेले थे

    कुत्ते नें कहा, गधे भाई ! अच्छा मौका है , भाग चलें

    गधे नें कहा , नहीं तुम भाग जाओ, मैं तो यहीं रहूँगा

    कुत्ते नें कहा , धोबी हमें इतना मारता है , इतना काम लेता है , फ़िर भी तुम यहाँ रहना चाहते हो ?

    गधें नें कहाँ , हाँ ! ये तो है , वर्तमान तो हमारा खराब है , लेकिन मुझे मेरा भविष्य उज्जवल

    लगता है कुत्ते नें पूछा , ऐसे क्यों ? ऐसा क्यों ?

    कई बार पूछने और बहुत जोर देनें पर गधे नें , मन्द मन्द मुस्काते हुए कहा

    कल धोबी जब अपनीं सुन्दर बेटी पर गुस्सा हो रहा था तो उस से कह रहा था

    तू इतनी बेवकूफ़ है कि तेरी शादी किसी गधे से ही होगी …. ….

    अब पढिये ओम प्रकाश आदित्य जी कि एक बढ़िया कविता

    इधर भी गधे हैं उधर भी गधे हैं

    जिधर देखता हूँ गधे ही गधे हैं

    घोड़ों को मिलती नहीं घास देखो

    गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

    गधे हंस रहे आदमी रो रहा है

    हिन्दोस्ताँ में ये क्या हो रहा है….

    जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है

    जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

    जो खेतों में दीखे वो फ़सली गधा है

    जो माईक पे चीखे वो असली गधा है

    अब हमारी भी एक कविता पढिये

    हम गधे हैं

    एक दिन हुई एक गाधे से मुलाकात

    हुई हमारी मित्रता, शुरू हुई बात

    मैं ने पूछा गधे भाई

    क्या आप वास्तव में गधे हैं

    गधा बोला आपका प्रश्न सुनकर

    लगता है कि आप गधे हैं

    मै ने बात बिगड़ती देख

    वार्तालाप को दूसरी ओर घुमाया

    बहुत स्मार्ट लग रहे हो

    गधे को बताया

    गधे ने प्रशंसा के लिये

    आभार जताया

    खुश हो कर ढैंचू ढैंचू का

    मधुर स्वर सुनाया

    मैं ने पूछा गधे भाई

    क्या कार्य-क्षेत्र है तुम्हारा

    गधा बोला इम्पोर्ट ऐक्सपोर्ट का

    व्यापार है हमारा

    गधा बोला बहुत दिन बाद

    मिला कोई अपने जैसा

    क्या करते हो,

    काम चल रहा है कैसा?

    मैं बोला कविताएं लिखता हूं यार

    गधा बोला अभी थोड़ा काम है

    चलता हूं, नमस्कार!

    मैं बोला मज़ाक कर रहा था यार

    कम्प्यूटर के क्षेत्र में

    करियर को दे रहा हूं नये आयाम

    सुबह से लेकर शाम तक

    तुम्हारी तरह करता हूं काम

    गधा बोला वैसे कम्प्यूटर में

    रुचि तो मेरी भी थी

    लेकिन डैडी के व्यापार को

    मेरी जरूरत थी

    मैं बोला हम बेवकूफ़ इन्सान को

    गधे कहते हैं

    क्या तुम्हारी बिरादरी के लोग इस से

    रुष्ट रहते हैं

    गधा बोला इन्सान को गधा कहने पर

    हमें नहीं विरोध

    लेकिन गधे को इन्सान कहा

    तो ईंट से ईंट बजा देंगे

    दुलत्तियों की सज़ा देंगे

    करेंगे प्रतिरोध

    माना कि तुम्हारे यहां भी

    कुछ लोग चारा खाते हैं

    छोटे छोटे बच्चे हमारी तरह

    बोझ उठाते हैं

    और कुछ इन्सान वैसे ही गाते हैं

    जैसे कि हम रैंकते हैं

    लेकिन हमारे यहां

    कोई थोड़ी सी भी बेईमानी करे

    उसे बिरादरी से निकाल फेंकते हैं

    टेढ़ों के लिये टेढ़े ,

    सीधों के लिये सीधे हैं

    गर्व है कि हम गधे हैं

    गधे ने मुझ पर

    कुछ यूं प्रभाव जमाया

    मैं लगा सोचने भगवान ने मुझे

    गधा क्यों नहीं बनाया

    अब तो यही इच्छा है

    कि ज़िन्दगी में कुछ ऐसा कर जाऊँ

    समाज में, बिरादरी में

    हर जगह गधा कहलाऊँ !

    यह तो शुरुआत है अपनेपन को और बढाते रहेंगे , और प्रयास करूंगा आपके बारे में जानने का आपसे जुड़ने का |

    एक और विस्फोट

    लाल है अब शहर था कल तक गुलाबी
    मिट गया सिंदूर हाथ मेंहदी है अभी भी
    राख है वो आज मासूमियत उसकी हँसी
    सुलगेगी बस अब जिंदगी भर जिंदगी
    वो जहाँ जब भी जो चाहेंगे करेंगे
    हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे
    था लगा मन में वो कुछ सपने संजोने
    था क्या पता हैं पापियों के हम खिलौने
    बम फटे और साथ में अरमान उसके
    बहन खोयी भाई खोये खोये हैं बेटे किसी ने
    कैसे मरे कितने मरे दो चार दिन चर्चा करेंगे
    हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

    शर्ट के टुकड़े मिले हैं लाल गायब
    लाश भी मिलती नही कुछ को चहेतों की
    सरकार ने तो कर दिया है काम अपना
    एक कमेटी थोड़ा शोक थोड़ा पैसा
    ये धमाके कल हुए थे आज भी और कल भी होंगे
    हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

    नीरज त्रिपाठी

    ऐंटी सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी

    ऐंटी सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी

    लड़िकयों ने किया विचारमंथन
    टकराव का बनाया मन

    शुरू हुआ देशव्यापी धरना प्रदर्शन

    विचित्र समस्या आ गई आज

    जब लड़िकयों ने उठाई
    सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी
    के खिलाफ आवाज

    अब मुश्किल चुप रहना था
    लड़िकयों का बस केवल
    इतना कहना था

    इस कमेटी के कारण
    लड़के हमसे डरते हैं
    न हमें देखते हैं

    न प्रपोज करते हैं

    इस कमेटी का कोई नियम
    समझ में नहीं आता है

    केवल बारह सेकन्ड तक हमें
    देखने पर केस बन जाता है

    अरे ये कमेटी वाले इतनी सी
    बात क्यों नहीं समझते हैं
    कि हम इन लड़कों के लिये ही
    सजते संवरते हैं

    जब से यह कमेटी अस्तित्व में आई है
    जीवन हुआ नरक नीरसता छाई है

    हम भूले अपनी तारीफें
    भूले बाइक की सैर
    दुदार्न्त कमेटी वालों
    अब नहीं तुम्हारी खैर

    हम नारी शक्ति
    व्यापक रूप से दिखाएंगे
    किसी भी हाल में ऐंटी सेक्सुवल
    हैरैसमेन्ट कमेटी बनवाएंगे

    अन्याय अत्याचार के खिलाफ
    बिगुल बजने लगा
    प्रशासन का सिंहासन
    तेजी से हिलने लगा
    नारी शक्ति संगठित देख
    प्रशासन ने मानी हार
    ऐंटी सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी
    की मांग हुई स्वीकार

    नयी कमेटी बनते ही नियम
    तेजी से बदलने लगे
    लड़कों के व्यंग्य बांण एक बार फिर
    लड़िकयों पर चलने लगे

    बदला मौसम देख
    लड़िकयां आनन्द सागर में
    गोते लगाने लगीं
    एक बार फिर सजधजकर
    सार्वजनिक स्थलों पर आने लगीं

    अब किसी लड़की को देखा
    तो कम से कम बारह सेकन्ड
    देखना हुआ मजबूरी
    हर लड़के के लिये
    एक गर्लफ्रैन्ड हुई जरूरी

    बाइक चलाते समय
    हेलमेट या लड़की में से
    किसी एक से काम चलेगा
    अच्छे कमेन्टस पास करने वाले को
    आशिक प्रतिभा पुरूस्कार मिलेगा

    नये नियम तो बहुत हैं
    विस्तार से बताऊंगा
    अभी जाकर कुछ करता हूं
    नहीं तो कुछ न करने के
    केस में फंस जाऊंगा

    नीरज त्रिपाठी

    प्यार व्यार

     

    सोचा जब सब लेते हैं तो हम भी मजा लेंगे
    भोलू बनकर कब तक जीवन यापन करेंगे

    सुनहरा मौसम तिथि एकादशी कार्तिक मास
    कर दी शुरू हमने अपने प्यार की तलाश

    आंखों में आंखें हाथ हाथों में
    कट रहे थे दिन मीठी मीठी बातों में

    हम सिनेमा नहीं देखते थे वो बोलीं देखेंगे
    हमने सोचा चार दिन की जिंदगी है मजे लेंगे

    फिर तो
    पिज्जा बर्गर स्लो फ़ूड फास्ट फ़ूड सब कुछ खाया
    उधर पिता श्री सोचते लड़के का मनी आर्डर नहीं आया

    उसने खायीं कसमें हमने कुछ वादे किए
    यहाँ तक कि बच्चों के नाम तक सोच लिए

    तभी बच्चों के नाना जी ने तबाही मचा दी
    किसी और महापुरुष से तय की अंजली की शादी

    मैंने सोचा अंजली रोएगी उसने ठहाका लगाया
    बोली अरे वाह इतना अच्छा रिश्ता मेरे लिए आया

    बच्चों की माँ तो बच्चों के नाना जी से भी तेज निकली
    अच्छा रिश्ता देख आइस क्रीम की तरह पिघली

    ये पाँच साल पुरानी बात है
    आज अंजली उस  महापुरुष के दो बच्चों कि माँ है
    और हम अब भी ढूंढ रहे हैं
    हमारे होने वाले बच्चों की मम्मी कहाँ हैं

    पति या कुत्ता

    पति या कुत्ता
    नीरज त्रिपाठी

    उस दिन शर्मा जी जब घर लौटे तो उन्होने देखा कि पूरे घर में सजावट थी और बड़ा सा केक भी रखा था, शर्मा जी के कुछ सोचने से पहले ही उनकी पत्नी नीलू जी ने अचानक प्रकट होते हुए कहा ‘…सरप्राइज।’ शर्मा जी ने सोचा कि उन्हें अपना जन्मदिन याद नहीं लेकिन नीलू को याद है। इससे पहले कि उनकी आंखों से निकले आंसू फर्श पर बिछे कालीन को गीला करते नीलू जी बोलीं, ‘पता है आज जोजो का जन्मदिन है,जोजो नीलू जी का लाड़्ला कुत्ता।’

    शर्मा जी को तो जैसे किसी ने बीसवीं मन्जिल से धक्का दे दिया हो, क्योंकि उन्हें अब याद आ चुका था कि उनका जन्मदिन पिछले महीने था और वो वैसे ही निकल गया था, जैसे सरकारी दफ्तर में मेज के नीचे से काला धन जिसका किसी को पता नहीं चलता कि कब कहां से आया और कहां गया। शर्मा जी भले ही जोजो के जन्मदिन की तैयारियों से अनभिज्ञ हों उनके क्रेडिट कार्ड ने नीलू जी का भरपूर सहयोग किया।

    शर्मा जी अब अपने आंगन में बच्चों की किलकारियां सुनना चाहते थे लेकिन नीलू जी के विचार इस मामले में (और मामलों की तरह) शर्मा जी से अलग थे, वो कहतीं,
    ‘अगर बच्चों की जिम्मेदारी हम पर आएगी तो हम जोजो का ध्यान अच्छे से नहीं रख
    पाएंगे।‘ शर्मा जी भविष्य के बारे में सोचकर सिहर जाते, जब उनके मित्र अपने बच्चों की पापा पापा की आवाज सुनकर हर्षाएंगे और शर्मा जी को जोजो की पीं पीं पीं पीं सुनकर सन्तोष करना पड़ेगा।

    शर्मा जी अगर भूल से जोजो को कुत्ता कह देते तो उनकी सजा थी तब तक जोजो से सॉरी बोलते रहना जब तक वो उन्हें माफ करके खुशी से अपनी पूंछ न हिला दे। शर्मा जी पर जोजो ने जो जो सितम ढाए, शर्मा जी सब सहते गए। नीलू जी जब शर्मा जी से नाराज होतीं तो उन्हें कोसतीं कि मेरे साथ रहते रहते जोजो की पूंछ सीधी हो गयी लेकिन तुम कभी नहीं सुधरोगे।

    जब नीलू जी जोजो के साथ चलतीं तो लोग कहते कितना भाग्यशाली कुत्ता है, और जब वो शर्मा जी के साथ चलतीं तो लोग कहते कितना अभागा पति है। कभी कभी तो शर्मा जी का ये हाल देख मोहल्ले वालों की हंसी वैसे ही फूट पड़ती जैसे खुले मेनहोल से बारिश का पानी उफना कर निकलता है।

    एक तो मोहल्ले वालों के ताने और दूसरा नीलू जी का उनके प्रति सौतेला व्यवहार, शर्मा जी क्षुब्ध होकर बोल पड़े या तो इस घर में जोजो रहेगा या मैं! नीलू जी बोलीं कि उन्हें सोंचने के लिए थोड़ा समय चाहिए और फिर गहन विचार मन्थन के बाद उन्होंने फैसला कर लिया।

    शर्मा जी का पति वाला रिश्ता कुत्ते पर भारी पड़ा और वो भार उठाने में नीलू जी असमर्थ थीं, नीलू जी ने जोजो को अपने पास रखने का फैसला किया।

    शर्मा जी आजकल एक किराए के मकान में रहते हैं।

    नीरज त्रिपाठी

    महाराष्ट्र में नवनिर्माण

    बस एक ध्येय बस एक लक्ष्य वो जहर उगलते जाते हैं
    भावुक भोली जनता का ख़ुद को शुभचिंतक बतलाते हैं
    सत्ता लोलुप घडियालों का कोई ईमान नही होता
    नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता
    निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता

    बन रहे शेर सब आज भेडिये खूनी दांत छिपाते हैं
    पूज्य शिवाजी को वो अपना आदर्श बताते हैं
    क्या इन ओछी घटनाओं से उन वीरों का अपमान नहीं होता
    नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता
    निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता

    उजले कपडों की चमचम से वो मन का मैल छिपाते हैं
    सुलझे मुद्दों में आग लगा वो जनता को भड़काते हैं
    कपट द्वेष से कोई  यशस्वी आयुष्मान नहीं होता
    नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता
    निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता

    फसल प्यार की काट वहाँ नफरत के बीज उगाते हैं
    हिंसक घटनाओं को बेशर्मी से जायज ठहराते हैं
    मार पीट हिंसा से कभी कहीं कोई उत्थान नहीं होता
    नकारात्मक भावों का जग में सम्मान नहीं होता
    निर्दोषों की लाशों पर चढ़ नवनिर्माण नहीं होता

    नीरज त्रिपाठी

    नोट – नीरज त्रिपाठी

    नोट

    कुछ नोट
    जिन्हें देख रिक्शे वाले,खोमचे वाले
    कहते हैं
    बहुत बड़ा नोट है बाबू टूटे दो

    वही नोट
    शराब के ठेके पर, उस विदेशी शोरूम में
    लगते हैं
    बहुत छोटे……….

    नीरज त्रिपाठी