• Meta

  • Spam Blocked

  • कारगिल

      से है कन्याकुमारी

    जहां तक सीमा हमारी

    से है कश्मीर भी

     और से ही है कारिगल

      से ही था वह कबूतर

     शान्ति का हमने उड़ाया

    लेकिन हमेशा की तरह

     इस बार भी है धोखा खाया

     शत्रु ने जब भी है छेड़ा

    हर बार हमने है खदेड़ा

    शान्ति के हम हैं पुजारी

     लेकिन हुआ जब युद्व जारी 

    युद्व के इस सघन पथ में

    मां की रक्षा की शपथ में

    शस्त्र हमने हैं उठाए

    शत्रु ही अब नजर आए

     जिन्दगी की चाह किसको

    मौत की परवाह किसको

    जीवित अगर हम बच गये

    तो विजयतिलक करवाएंगे

    सौभाग्य से यदि मिली मृत्यु

    तो हम शहीद कहलाएंगे

     देशहित में कई दीपक

    ज्योति अपनी दे चले

     उत्साह था उल्लास था

    इस देश को सब दे चले 

    मां की अश्रुधार बहती

     वो तो बस इतना ही कहती

    लाल मेरा क्यों आए

    कि तेरी मां बुलाए 

    छोड़ दे अब बचपना ये

     मां को क्यों इतना सताए

    गले से तू लिपट जा

    मेरे आंचल में सिमट जा

      छुपा लूंगी तुझे मैं

    जाने दूंगी कहीं मैं

    इक्कीस का ही था अभी वह

     दूर इतनी क्यों गया

    लाडला मेरा दुलारा

     नींद गहरी सो गया

     माना मेरा वह लाल प्यारा

    दूर मुझसे आज है

     लेकिन मुझे उस वीर की

     वीरता पर नाज है

     पानी अगर हो रगों में तो

     दुश्मनों को माफ कर दो

    यदि दूध मां का है पिया तो

     जड़ों से ही साफ कर दो

     पुनः यदि कुद्रष्टि डाली

     तो फिर वो मुंह की खाएंगे

     हमें है सौगन्ध यह

    हम जीतकर ही आएंगे

     हम तिरंगा अपना प्यारा

    शान से फहराएंगे

    सम्मान से फहराएंगे

    अभिमान से  फहराएंगे

    1 Comment(s)

    1. Comment by अनूप शुक्ल on March 23, 2008 2:46 pm

      सही है।

    Comments RSS TrackBack Identifier URI

    Leave a comment