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  • हमारे पतलू भाई

    हमारे पतलू भाई
    नीरज त्रिपाठी

    पतलू भाई जिन्हें कुछ लोग किताबी कीड़ा कहते तो कुछ किताबें चाटने वाला दीमक। पतलू भाई थे मस्त मौला जो इन सब बातों को सुनकर वैसे ही अनसुना कर दिया करते जैसे संगीत के जानकार आजकल के फ़िल्मी गानों को। पढ़ाई और तैयारी तक तो सब ठीक रहता लेकिन परिणाम का तो जैसे छत्तीस का आँकड़ा था हमारे पतलू भाई से, कभी उनके पक्ष में आता ही नहीं था और पतलू भाई चाहें जो कर लें, जब भी परिणाम आता, तो पतलू भाई का डब्बा गोल हो जाया करता था। पतलू भाई का परिणाम एक बार फिर आया और अनुक्रमांक अख़बार में छपते-छपते रह गया जबकि इस बार तो अनुक्रमांक एक सम संख्या थी और लोकसभा मार्ग पर बैठे ज्योतिषाचार्य के तोते ने जो चिठ्ठी निकाली थी उस हिसाब से तो पतलू भाई को उत्तीर्ण हो जाना चाहिए था। इस बार तो पतलू भाई ने इतनी मेहनत की थी कि चप्पल घिस गई थी, पतलून फट गई थी।

    अब होनी को कौन टाल सकता है, ये पाँचवी बार लगातार अनुत्तीर्ण होने वाली दुर्घटना घट ही गई। बारहवीं कक्षा की पढ़ाई कठिन है ये तो पतलू भाई ने सुना था लेकिन बारहवीं और दसवीं की पढ़ाई में इतना अंतर है इसका एहसास उन्हें आज हुआ। दसवीं में पतलू भाई ने तीसरे प्रयास में ही विजय पताका फहरा दी थी। पतलू भाई पढ़-लिखकर डाक्टर बनना चाहते थे लेकिन इस बारहवीं में अनुत्तीर्ण होने वाली घटना ने उनके डाक्टर बनने के सपने का पोस्टमार्टम कर डाला। पतलू भाई ने सुन रखा था कि असफलता निराशा का सूत्र कभी नहीं अपितु वह तो एक नई प्रेरणा है, तो इस पाँचवीं लगातार असफलता से प्रेरणा लेकर पतलू भाई ने सोचा कि बहुत हो गई पढ़ाई अब कुछ और ही किया जाए। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अपना जीवन लेने के लिए नहीं, देने के लिए है, तो पतलू भाई भी कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे उन्हें संतुष्टि मिल सके और समाज को कुछ दे पाने की चाहत तो मन में हिलोरें ले ही रही थी।

    मनन, चिंतन और गहन विचारमंथन के बाद पतलू भाई ने आख़िर सोच ही लिया की करना क्या है और बस लग गए तन-मन-धन से अपने नए कार्य में। स्वयं को समाज को समर्पित करने की ठान ली थी उन्होंने। बहुत कम समय में ही पतलू भाई महज़ पतलू भाई नहीं रहे बल्कि एक शख्स़ियत बन गए। अब पतलू भाई स्वयं तो डाक्टर नहीं बन पाए लेकिन न जाने कितने ही लोग उनकी शरण में आकर डाक्टर बन गए और अभी पतलू भाई की तुलना पारस पत्थर से की जाने लगी थी, पारस पत्थर चीज़ों को सोना बनाता था और पतलू भाई लोगों को डाक्टर। तो समाज की बीमारियाँ तो उन्होंने इतने डाक्टर बनाकर लगभग दूर कर दीं साथ ही कुछ इंजीनियर भी दे डाले।
    सिसरो ने कहा था जीवन में बुद्धि का नहीं लक्ष्मी का साम्राज्य है, यह बात पतलू भाई को हर्षित कर देती थी। पतलू भाई थे लक्ष्मी जी के अनन्य भक्त और ये बात जगजाहिर थी तो लोग पतलू भाई को लक्ष्मी जी के दर्शन कराते और पतलू भाई आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के पर्चे के। पतलू भाई किसी भी पर्चे को बहुत ही सहजता से परीक्षा से पहले ही अपने शुभचिंतकों को और उन लोगों को जो उन्हें लक्ष्मी जी के दर्शन करा सकते थे, उपलब्ध करा दिया करते थे। पतलू भाई के पर्चे जाने कहाँ से चुपके से आते और कुछ चुनिंदा लोगों को लाभान्वित कर वैसे ही निकल जाया करते थे जैसे सरकारी राशन की दुकान से चीनी। आम लोगों को न चीनी का पता चलता न पर्चे का। एक बार मेरी मुलाक़ात ऐसे ही पतलू भाई से हो गई थी, चल पड़ी बात, मैंने पूछा- पतलू भाई आप कौन-सी परीक्षाओं के पर्चे निकलवाते हैं। पतलू भाई ने कुटिल मुस्कान चेहरे पर धारण कर गौरवान्वित होते हुए कहा- मेरे पास आइए, लक्ष्मी के दर्शन कराइए, परीक्षा का नाम बताइए, पर्चा ले जाइए।

    पतलू भाई की यह बात सुनकर मेरी आँखें वैसे ही खुली रह गईं जैसे न्यायालय में चल रहे केस की फ़ाइल जो एक बार खुलती है तो बंद होने का नाम ही नहीं लेती। पतलू भाई का समाज सेवा का काम अच्छे से चल रहा था लेकिन इधर मौसम में परिवर्तन हुआ और उधर पतलू भाई के निवास स्थान में, अभी पतलू भाई से जेल में मिला जा सकता था, न जाने कैसे पतलू भाई की ये समाज सेवा वाली बात पुलिस को पता चल गई थी। पतलू भाई कहते हैं कि वो उन छात्रों की मदद कर रहे थे जिनके सपने वैसे शायद कभी पूरे न हो पाते। तो इस प्रकार से वो उन छात्रों की मदद कर रहे थे जिनको पाठय पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति लोरियाँ सुनाती थीं और फिर जो तेज़ दिमाग़ वाले हैं वो तो कभी भी कहीं भी सफलता का गीत गा सकते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि एक साथ विवेक और लक्ष्मी का वरदान विरलों को ही मिलता है। वर्तमान समय में जिसके पास विवेक है उसके सफल होने की संभावना है और जिसके पास लक्ष्मी है उसकी सफलता निश्चित है। पतलू भाई सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करते थे और अपना काम करते-करते पाँच दस लाख जो भी बन जाया करते उसी में रुखा-सूखा खाकर वो अपना गुज़ारा कर लिया करते थे।

    पतलू भाई को जेल में आए हुए दस महीने बीत चुके थे और वो जेल की सुविधाओं का भरपूर आनंद उठा रहे थे। इधर स्थानीय अख़बारों में एक ख़बर मोटे-मोटे अक्षरों में छपी थी, एक बार फिर मेडिकल परीक्षा का पर्चा आउट।

    पतलू भाई जेल में बैठ कर गर्व का अनुभव कर रहे थे और ये सोंचकर उनकी आँखें नम हो गई थीं कि कोई है जो उनके अधूरे सपने को पूरा कर रहा है। मैं और मेरे जैसे कुछ लोग जो एक पतलू भाई के गिरफ़्तार होने से खुश थे वो अनेक पतलू भाइयों को उदित होते देख सोंच रहे थे कि शायद सच में ये युग पतलू भाई और उनके समर्थकों का है और इसमें तंग जेब वाले पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को सफल होने का कोई अधिकार नहीं है। मुंशी जी ने गोदान में बिल्कुल सही लिखा था, हमें संसार में रहना है तो धन की उपासना करनी पड़ेगी, इसी से लोक परलोक में कल्याण होगा। पतलू भाई का अगला लक्ष्य नेता बनकर समाज की सेवा करना है।

    5 Comments

    1. Comment by समीर लाल on March 11, 2008 1:09 am

      बेचारे पतलू भाई…इतने ऊँचे विचार..कोमल हृदयी को इन अत्याचारियों ने जेल कर दी…बेड़ा गर्क हो जायेगा इन सबका जब हमारे पतलू भाई नेता हो जायेंगे. :)

      धन्य हैं आप जो आप इन्हें खदेड़ते हुए ब्लॉग तक ले आये. जय हो आपकी और शुभकामनाऎं पतलू भाई को.

    2. Comment by Sanjeet Tripathi on March 11, 2008 6:18 am

      धांसू!!
      पतलू तो अपन भी है ;)

    3. Comment by ghughutibasuti on March 11, 2008 9:04 am

      पतलू भाई से मिलकर खुशी हुई ।
      घुघूती बासूती

    4. Comment by महावीर on March 11, 2008 4:22 pm

      नीरज
      पतलू भाई जब जेल से आजाएं तो बताना। समाज-सेवक तो चाहे बाहर हो, या जेल के अंदर हो, सेवा करनी है। जेल में उनकी सेवाओं का विवरण भी होसके तो लिखना।

    5. Comment by अनूप शुक्ल on March 23, 2008 2:45 pm

      पतलू तेरा ये बलिदान, याद करेगा हिन्दुस्तान!

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