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  • एक और विस्फोट

    लाल है अब शहर था कल तक गुलाबी
    मिट गया सिंदूर हाथ मेंहदी है अभी भी
    राख है वो आज मासूमियत उसकी हँसी
    सुलगेगी बस अब जिंदगी भर जिंदगी
    वो जहाँ जब भी जो चाहेंगे करेंगे
    हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे
    था लगा मन में वो कुछ सपने संजोने
    था क्या पता हैं पापियों के हम खिलौने
    बम फटे और साथ में अरमान उसके
    बहन खोयी भाई खोये खोये हैं बेटे किसी ने
    कैसे मरे कितने मरे दो चार दिन चर्चा करेंगे
    हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

    शर्ट के टुकड़े मिले हैं लाल गायब
    लाश भी मिलती नही कुछ को चहेतों की
    सरकार ने तो कर दिया है काम अपना
    एक कमेटी थोड़ा शोक थोड़ा पैसा
    ये धमाके कल हुए थे आज भी और कल भी होंगे
    हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

    नीरज त्रिपाठी

    4 Comments

    1. अति निन्दनीय एवं दुखद घटना.

    2. जब कुछ इंसान मर जाते है
      तो बहुत सारे इंसान मारे जाते है..

      जयपुर जैसे शांतिप्रिय शहर में ऐसी घटना की उम्मीद नही की थी.. अभी तक मन विचलित है..

      ईश्वर से प्रार्थना है हादसे के शिकार लोगो को शांति मिले और दोषियो को सज़ा..

    3. बहुत ही भावुक दिल हिलाने वाला चित्रण है। पढ़ कर हृदय विह्वल हो उठा।
      नीरज अभी तक तुम केवल हास्य और व्यंग्यात्मक रचनाओं के लिए
      जाने जाते थे, किंतु आज ‘एक और विस्फोट’ और ‘कारगिल’ कविताएं पढ़
      कर तुम्हारे दूसरे पहलू को देख कर नमन करता हूं।
      महावीर

    4. त्रिपाठी जी
      मेरे शहर जयपुर के बारे में लिखी ये रचना अन्दर तक भिगो गयी…सच कहा आपने “हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे”. कितनी जल्दी हम भूल जाते हैं की हमारे भाई बहनो के साथ कब क्या हुआ था. जब तक हमें ख़ुद पीड़ा ना हो दूजे की पीड़ा का एहसास ही नहीं होता हमें…और शायद येही वजह है की दुश्मनों का हौसला बढ़ने की.
      नीरज


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