बहुत दिनों से सोच रहा था कि ब्लॉग पर कुछ ऐसा लिखूं जिसे पढ़कर पाठक कुछ अपनापन महसूस करें |
किसी चीज में भी कोई तब ज्यादा आनंद पाता है जब उसे अपने से जोड़ पाये | सोचा दो मूर्खों की कहानी लिखता हूँ , समझ लीजिये पहला मैं और दूसरे …. | लेकिन फिर सोचा कि सब लोग तो मूर्ख नही होते और होते भी हैं तो मानते नहीं | मुझसे भी लोगों ने कई बार बोला कि ये क्या मूर्खता है आपसे भी बोला होगा , हो सकता है कुछ अधिक बार , ये सब तो चलता रहता है |
खैर कुछ प्रयास किया है आपसे और जुड़ने का , आपके बारे में और जानने का |
पहले एक कहानी
गाँव में एक धोबी था । उस के पास एक कुत्ता था और एक गधा था। धोबी उन दोनों से बहुत काम लेता
था, मारता, पीटता था , खाना भी कम देता था ।
एक दिन धोबी अपनें परिवार के साथ शहर गया । घर में कुत्ता और गधा अकेले थे ।
कुत्ते नें कहा, गधे भाई ! अच्छा मौका है , भाग चलें ।
गधे नें कहा , नहीं तुम भाग जाओ, मैं तो यहीं रहूँगा ।
कुत्ते नें कहा , धोबी हमें इतना मारता है , इतना काम लेता है , फ़िर भी तुम यहाँ रहना चाहते हो ?
गधें नें कहाँ , हाँ ! ये तो है , वर्तमान तो हमारा खराब है , लेकिन मुझे मेरा भविष्य उज्जवल
लगता है । कुत्ते नें पूछा , ऐसे क्यों ? ऐसा क्यों ?
कई बार पूछने और बहुत जोर देनें पर गधे नें , मन्द मन्द मुस्काते हुए कहा …
कल धोबी जब अपनीं सुन्दर बेटी पर गुस्सा हो रहा था तो उस से कह रहा था –
“तू इतनी बेवकूफ़ है कि तेरी शादी किसी गधे से ही होगी …. ….
अब पढिये ओम प्रकाश आदित्य जी कि एक बढ़िया कविता
इधर भी गधे हैं उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ गधे ही गधे हैं
घोड़ों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो
गधे हंस रहे आदमी रो रहा है
हिन्दोस्ताँ में ये क्या हो रहा है….
जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है
जो खेतों में दीखे वो फ़सली गधा है
जो माईक पे चीखे वो असली गधा है
अब हमारी भी एक कविता पढिये
हम गधे हैं
एक दिन हुई एक गाधे से मुलाकात
हुई हमारी मित्रता, शुरू हुई बात
मैं ने पूछा गधे भाई
क्या आप वास्तव में गधे हैं
गधा बोला आपका प्रश्न सुनकर
लगता है कि आप गधे हैं
मै ने बात बिगड़ती देख
वार्तालाप को दूसरी ओर घुमाया
बहुत स्मार्ट लग रहे हो
गधे को बताया
गधे ने प्रशंसा के लिये
आभार जताया
खुश हो कर ढैंचू ढैंचू का
मधुर स्वर सुनाया
मैं ने पूछा गधे भाई
क्या कार्य-क्षेत्र है तुम्हारा
गधा बोला इम्पोर्ट ऐक्सपोर्ट का
व्यापार है हमारा
गधा बोला बहुत दिन बाद
मिला कोई अपने जैसा
क्या करते हो,
काम चल रहा है कैसा?
मैं बोला कविताएं लिखता हूं यार
गधा बोला अभी थोड़ा काम है
चलता हूं, नमस्कार!
मैं बोला मज़ाक कर रहा था यार
कम्प्यूटर के क्षेत्र में
करियर को दे रहा हूं नये आयाम
सुबह से लेकर शाम तक
तुम्हारी तरह करता हूं काम
गधा बोला वैसे कम्प्यूटर में
रुचि तो मेरी भी थी
लेकिन डैडी के व्यापार को
मेरी जरूरत थी
मैं बोला हम बेवकूफ़ इन्सान को
गधे कहते हैं
क्या तुम्हारी बिरादरी के लोग इस से
रुष्ट रहते हैं
गधा बोला इन्सान को गधा कहने पर
हमें नहीं विरोध
लेकिन गधे को इन्सान कहा
तो ईंट से ईंट बजा देंगे
दुलत्तियों की सज़ा देंगे
करेंगे प्रतिरोध
माना कि तुम्हारे यहां भी
कुछ लोग चारा खाते हैं
छोटे छोटे बच्चे हमारी तरह
बोझ उठाते हैं
और कुछ इन्सान वैसे ही गाते हैं
जैसे कि हम रैंकते हैं
लेकिन हमारे यहां
कोई थोड़ी सी भी बेईमानी करे
उसे बिरादरी से निकाल फेंकते हैं
टेढ़ों के लिये टेढ़े ,
सीधों के लिये सीधे हैं
गर्व है कि हम गधे हैं
गधे ने मुझ पर
कुछ यूं प्रभाव जमाया
मैं लगा सोचने भगवान ने मुझे
गधा क्यों नहीं बनाया
अब तो यही इच्छा है
कि ज़िन्दगी में कुछ ऐसा कर जाऊँ
समाज में, बिरादरी में
हर जगह गधा कहलाऊँ !
यह तो शुरुआत है अपनेपन को और बढाते रहेंगे , और प्रयास करूंगा आपके बारे में जानने का आपसे जुड़ने का |
6 Comments
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अब क्या कहें. गद्य भी बढ़िया. अओमप्रकाश जी रचना तो पहले भी सुनी थी-आपकी आज सुन ली. काफी अपनापन बढ़ गया.
वाह जी वाह.
नीरज नाम को ही वरदान है.
कमाल का लिखा आपने.
लेकिन अपने साथ-साथ मुझे क्यों लपेटा?
उत्तम!
बड़ी धांसू पोस्ट है। मज़ा आगया।
wah!! wah!!
Bahut badiya. yeh kavita Wipro ke induction ki yaad dilati hai!!