सैर सपाटा

पिछले महीने एक हफ्ते की छुट्टी मिली | मन में उमंगें और उत्साह लिए उछलते हुए निकल पड़े हम एक शहर की सैर पर | ट्रेन के सफर में हमारा अंतर्मन कुछ ज्यादा मजा लेता है तो हम छुक्छुकाने  लगे एक सुपरफास्ट एक्सप्रेस और उसमें बैठे कुछ सहयात्रियों के साथ | इधर ट्रेन ने प्लेटफार्म पर रेंगना शुरू किया उधर लोगों के खाने के डिब्बे खुलने लगे | इस.से पहले कि उन चटपटी चीजों कि खुशबू से मुहँ में बाढ़ आ जाए हम सरक लिए अपनी सीट पर | अपर बर्थ का यही फायदा है जब मन हो नीचे बैठो नही तो ऊपर जाकर अपनी सीट पर पसर जाओ | लोअर बर्थ वाले लोअर क्लास लोगों की तरह प्रताडित किए जाते हैं |

कुछ घंटों बाद सोचा अपनी सीट पर बैठा जाए | सहयात्री अब भी तन्मयता से पगुराने में जुटे थे | माँ की सिखाई बातें दिमाग में आ रही थीं | हाथ खिड़की से बाहर मत निकालना, ट्रेन में खरीद कर कुछ मत खाना, किसी का दिया मत खाना | हाथ तो काबू में था लेकिन जबान …… तभी एक चने वाला आया, सब खाने लगे हम पहले ही अपने मन को बहुत मार चुके थे इस बार सोचा ‘महाजनः ये गतः सः पन्थः’ और हम भी स्वाद के पथ पर चल पड़े |

चने स्वादिष्ट थे जब चने ख़त्म हुए तो हमारी नजर अखबार के उस टुकड़े पर छपी ख़बर पर पड़ी जिसमें हमने चने खाए थे | ख़बर थी ट्रेन में जहरखुरानी से चार की मौत | यह पढ़ हमारी शकल पर बारह बज रहे थे और घड़ी में छः | हमारी मंजिल आने वाली थी कि कुछ हिजड़े आ गए | कुछ लोगों ने उन्हें पैसे दिए तो कुछ ने बहाने | हम भी बहाना बनाते हुए बोले हम तो पढने लिखने वाले हैं तो वो बोले पढने लिखने वाले हो तो हमें भी प्यार वाली ट्यूशन पढ़ा दो न पप्पू |

सफर के इन हिचकोलों में हमारे दिमाग की बत्ती बुझ चुकी थी, ट्रेन ने एक बार फिर रेंगना शुरू किया | ट्रेन के रुकते ही हम जल्दी से निकास के तीर देखते देखते स्टेशन से बाहर थे |  अब तक हमारे दिमाग की बत्ती गुल थी बाहर देखा तो शहर में भी बिजली रानी के नखरे चल रहे थे |

इसको सताया उसको चिढाया
इधर से गई उधर से निकली
कोई न जाने कब आएगी बिजली

हम स्टेशन से बाहर निकले उधर हमारा पर्स हमारी जेब से |  हमारे पर्स की हमसे ज्यादा जरूरत किसी और को थी इसीलिए शायद किसी ने … खैर बैग में पड़े कुछ पैसों से ऑटो वाले को पैसे दे पहुचे हम एक होटल | वहाँ एक कमरा लिया और चौड़े हो गए |

सुबह उठकर हम सैर पर निकल पड़े | सड़क पर खुले मेनहोल और गड्ढे बांह पसारे मुस्कुराते हुए हमें अपने पास बुला रहे थे | अद्भुत चमक थी उनकी आंखों में | हम सोचने लगे

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
रोज कितनों को गिरा रहे हो |

फिर जब प्यास लगी तो देखा

कहीं कहीं इक्के दुक्के नल लोगों को पानी पिला रहे थे
बाकी ज्यादातर खुलते ही आशिक बन सीटी बजा रहे थे |

प्रदूषण पर दसंवी कक्षा में निबंध लिखने को आया था | तब तो हम गच्चा खा गए थे आज कोई लिखने को कहता तो ऐसा चित्र खीचते कि.. प्रदूषण के साक्षात दर्शन हो रहे थे | वहीँ आगे धुएँ के गुबार के बीच पुलिस वाले भइया ट्रक वालों को रोक कर न जाने क्या थोडी बातें करते फिर एक हाँथ जेब में जाता दूसरे से आगे बढ़ने का इशारा किया जाता | यह नुक्कड़ नाटक लगभग सभी चौराहों पर खेला जा रहा था |

यह सब देख हमें सैर का जो शौक चर्राया था वो अब चरमरा चुका था | खैर लौटकर हमने अपना यात्रा वृतांत देश के विभिन्न शहरों में रह रहे अपने मित्रों को लिख भेजा |  सभी से नाराजगी भरे पत्र आए |
सबने लिखा अच्छी दोस्ती निभायी हमारे शहर में आकर चले गए और हमें ख़बर भी नहीं की |

ऐंटी सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी

ऐंटी सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी

लड़िकयों ने किया विचारमंथन
टकराव का बनाया मन

शुरू हुआ देशव्यापी धरना प्रदर्शन

विचित्र समस्या आ गई आज

जब लड़िकयों ने उठाई
सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी
के खिलाफ आवाज

अब मुश्किल चुप रहना था
लड़िकयों का बस केवल
इतना कहना था

इस कमेटी के कारण
लड़के हमसे डरते हैं
न हमें देखते हैं

न प्रपोज करते हैं

इस कमेटी का कोई नियम
समझ में नहीं आता है

केवल बारह सेकन्ड तक हमें
देखने पर केस बन जाता है

अरे ये कमेटी वाले इतनी सी
बात क्यों नहीं समझते हैं
कि हम इन लड़कों के लिये ही
सजते संवरते हैं

जब से यह कमेटी अस्तित्व में आई है
जीवन हुआ नरक नीरसता छाई है

हम भूले अपनी तारीफें
भूले बाइक की सैर
दुदार्न्त कमेटी वालों
अब नहीं तुम्हारी खैर

हम नारी शक्ति
व्यापक रूप से दिखाएंगे
किसी भी हाल में ऐंटी सेक्सुवल
हैरैसमेन्ट कमेटी बनवाएंगे

अन्याय अत्याचार के खिलाफ
बिगुल बजने लगा
प्रशासन का सिंहासन
तेजी से हिलने लगा
नारी शक्ति संगठित देख
प्रशासन ने मानी हार
ऐंटी सेक्सुवल हैरैसमेन्ट कमेटी
की मांग हुई स्वीकार

नयी कमेटी बनते ही नियम
तेजी से बदलने लगे
लड़कों के व्यंग्य बांण एक बार फिर
लड़िकयों पर चलने लगे

बदला मौसम देख
लड़िकयां आनन्द सागर में
गोते लगाने लगीं
एक बार फिर सजधजकर
सार्वजनिक स्थलों पर आने लगीं

अब किसी लड़की को देखा
तो कम से कम बारह सेकन्ड
देखना हुआ मजबूरी
हर लड़के के लिये
एक गर्लफ्रैन्ड हुई जरूरी

बाइक चलाते समय
हेलमेट या लड़की में से
किसी एक से काम चलेगा
अच्छे कमेन्टस पास करने वाले को
आशिक प्रतिभा पुरूस्कार मिलेगा

नये नियम तो बहुत हैं
विस्तार से बताऊंगा
अभी जाकर कुछ करता हूं
नहीं तो कुछ न करने के
केस में फंस जाऊंगा

नीरज त्रिपाठी

प्यार व्यार

 

सोचा जब सब लेते हैं तो हम भी मजा लेंगे
भोलू बनकर कब तक जीवन यापन करेंगे

सुनहरा मौसम तिथि एकादशी कार्तिक मास
कर दी शुरू हमने अपने प्यार की तलाश

आंखों में आंखें हाथ हाथों में
कट रहे थे दिन मीठी मीठी बातों में

हम सिनेमा नहीं देखते थे वो बोलीं देखेंगे
हमने सोचा चार दिन की जिंदगी है मजे लेंगे

फिर तो
पिज्जा बर्गर स्लो फ़ूड फास्ट फ़ूड सब कुछ खाया
उधर पिता श्री सोचते लड़के का मनी आर्डर नहीं आया

उसने खायीं कसमें हमने कुछ वादे किए
यहाँ तक कि बच्चों के नाम तक सोच लिए

तभी बच्चों के नाना जी ने तबाही मचा दी
किसी और महापुरुष से तय की अंजली की शादी

मैंने सोचा अंजली रोएगी उसने ठहाका लगाया
बोली अरे वाह इतना अच्छा रिश्ता मेरे लिए आया

बच्चों की माँ तो बच्चों के नाना जी से भी तेज निकली
अच्छा रिश्ता देख आइस क्रीम की तरह पिघली

ये पाँच साल पुरानी बात है
आज अंजली उस  महापुरुष के दो बच्चों कि माँ है
और हम अब भी ढूंढ रहे हैं
हमारे होने वाले बच्चों की मम्मी कहाँ हैं

पति या कुत्ता

पति या कुत्ता
नीरज त्रिपाठी

उस दिन शर्मा जी जब घर लौटे तो उन्होने देखा कि पूरे घर में सजावट थी और बड़ा सा केक भी रखा था, शर्मा जी के कुछ सोचने से पहले ही उनकी पत्नी नीलू जी ने अचानक प्रकट होते हुए कहा ‘…सरप्राइज।’ शर्मा जी ने सोचा कि उन्हें अपना जन्मदिन याद नहीं लेकिन नीलू को याद है। इससे पहले कि उनकी आंखों से निकले आंसू फर्श पर बिछे कालीन को गीला करते नीलू जी बोलीं, ‘पता है आज जोजो का जन्मदिन है,जोजो नीलू जी का लाड़्ला कुत्ता।’

शर्मा जी को तो जैसे किसी ने बीसवीं मन्जिल से धक्का दे दिया हो, क्योंकि उन्हें अब याद आ चुका था कि उनका जन्मदिन पिछले महीने था और वो वैसे ही निकल गया था, जैसे सरकारी दफ्तर में मेज के नीचे से काला धन जिसका किसी को पता नहीं चलता कि कब कहां से आया और कहां गया। शर्मा जी भले ही जोजो के जन्मदिन की तैयारियों से अनभिज्ञ हों उनके क्रेडिट कार्ड ने नीलू जी का भरपूर सहयोग किया।

शर्मा जी अब अपने आंगन में बच्चों की किलकारियां सुनना चाहते थे लेकिन नीलू जी के विचार इस मामले में (और मामलों की तरह) शर्मा जी से अलग थे, वो कहतीं,
‘अगर बच्चों की जिम्मेदारी हम पर आएगी तो हम जोजो का ध्यान अच्छे से नहीं रख
पाएंगे।‘ शर्मा जी भविष्य के बारे में सोचकर सिहर जाते, जब उनके मित्र अपने बच्चों की पापा पापा की आवाज सुनकर हर्षाएंगे और शर्मा जी को जोजो की पीं पीं पीं पीं सुनकर सन्तोष करना पड़ेगा।

शर्मा जी अगर भूल से जोजो को कुत्ता कह देते तो उनकी सजा थी तब तक जोजो से सॉरी बोलते रहना जब तक वो उन्हें माफ करके खुशी से अपनी पूंछ न हिला दे। शर्मा जी पर जोजो ने जो जो सितम ढाए, शर्मा जी सब सहते गए। नीलू जी जब शर्मा जी से नाराज होतीं तो उन्हें कोसतीं कि मेरे साथ रहते रहते जोजो की पूंछ सीधी हो गयी लेकिन तुम कभी नहीं सुधरोगे।

जब नीलू जी जोजो के साथ चलतीं तो लोग कहते कितना भाग्यशाली कुत्ता है, और जब वो शर्मा जी के साथ चलतीं तो लोग कहते कितना अभागा पति है। कभी कभी तो शर्मा जी का ये हाल देख मोहल्ले वालों की हंसी वैसे ही फूट पड़ती जैसे खुले मेनहोल से बारिश का पानी उफना कर निकलता है।

एक तो मोहल्ले वालों के ताने और दूसरा नीलू जी का उनके प्रति सौतेला व्यवहार, शर्मा जी क्षुब्ध होकर बोल पड़े या तो इस घर में जोजो रहेगा या मैं! नीलू जी बोलीं कि उन्हें सोंचने के लिए थोड़ा समय चाहिए और फिर गहन विचार मन्थन के बाद उन्होंने फैसला कर लिया।

शर्मा जी का पति वाला रिश्ता कुत्ते पर भारी पड़ा और वो भार उठाने में नीलू जी असमर्थ थीं, नीलू जी ने जोजो को अपने पास रखने का फैसला किया।

शर्मा जी आजकल एक किराए के मकान में रहते हैं।

नीरज त्रिपाठी

मैं और तुम

उस दिन
मेरे घर से निकलते ही बंटू छींका
थोड़ा आगे गया तो बिल्ली ने रास्ता काटा

मैं ये सब मानता न था सो चलता रहा
उसी दिन मेरी तुमसे पहली मुलाक़ात हुई

अब मैं कट्टर अंध विश्वासी हूँ

हमारे पतलू भाई

हमारे पतलू भाई
नीरज त्रिपाठी

पतलू भाई जिन्हें कुछ लोग किताबी कीड़ा कहते तो कुछ किताबें चाटने वाला दीमक। पतलू भाई थे मस्त मौला जो इन सब बातों को सुनकर वैसे ही अनसुना कर दिया करते जैसे संगीत के जानकार आजकल के फ़िल्मी गानों को। पढ़ाई और तैयारी तक तो सब ठीक रहता लेकिन परिणाम का तो जैसे छत्तीस का आँकड़ा था हमारे पतलू भाई से, कभी उनके पक्ष में आता ही नहीं था और पतलू भाई चाहें जो कर लें, जब भी परिणाम आता, तो पतलू भाई का डब्बा गोल हो जाया करता था। पतलू भाई का परिणाम एक बार फिर आया और अनुक्रमांक अख़बार में छपते-छपते रह गया जबकि इस बार तो अनुक्रमांक एक सम संख्या थी और लोकसभा मार्ग पर बैठे ज्योतिषाचार्य के तोते ने जो चिठ्ठी निकाली थी उस हिसाब से तो पतलू भाई को उत्तीर्ण हो जाना चाहिए था। इस बार तो पतलू भाई ने इतनी मेहनत की थी कि चप्पल घिस गई थी, पतलून फट गई थी।

अब होनी को कौन टाल सकता है, ये पाँचवी बार लगातार अनुत्तीर्ण होने वाली दुर्घटना घट ही गई। बारहवीं कक्षा की पढ़ाई कठिन है ये तो पतलू भाई ने सुना था लेकिन बारहवीं और दसवीं की पढ़ाई में इतना अंतर है इसका एहसास उन्हें आज हुआ। दसवीं में पतलू भाई ने तीसरे प्रयास में ही विजय पताका फहरा दी थी। पतलू भाई पढ़-लिखकर डाक्टर बनना चाहते थे लेकिन इस बारहवीं में अनुत्तीर्ण होने वाली घटना ने उनके डाक्टर बनने के सपने का पोस्टमार्टम कर डाला। पतलू भाई ने सुन रखा था कि असफलता निराशा का सूत्र कभी नहीं अपितु वह तो एक नई प्रेरणा है, तो इस पाँचवीं लगातार असफलता से प्रेरणा लेकर पतलू भाई ने सोचा कि बहुत हो गई पढ़ाई अब कुछ और ही किया जाए। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अपना जीवन लेने के लिए नहीं, देने के लिए है, तो पतलू भाई भी कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे उन्हें संतुष्टि मिल सके और समाज को कुछ दे पाने की चाहत तो मन में हिलोरें ले ही रही थी।

मनन, चिंतन और गहन विचारमंथन के बाद पतलू भाई ने आख़िर सोच ही लिया की करना क्या है और बस लग गए तन-मन-धन से अपने नए कार्य में। स्वयं को समाज को समर्पित करने की ठान ली थी उन्होंने। बहुत कम समय में ही पतलू भाई महज़ पतलू भाई नहीं रहे बल्कि एक शख्स़ियत बन गए। अब पतलू भाई स्वयं तो डाक्टर नहीं बन पाए लेकिन न जाने कितने ही लोग उनकी शरण में आकर डाक्टर बन गए और अभी पतलू भाई की तुलना पारस पत्थर से की जाने लगी थी, पारस पत्थर चीज़ों को सोना बनाता था और पतलू भाई लोगों को डाक्टर। तो समाज की बीमारियाँ तो उन्होंने इतने डाक्टर बनाकर लगभग दूर कर दीं साथ ही कुछ इंजीनियर भी दे डाले।
सिसरो ने कहा था जीवन में बुद्धि का नहीं लक्ष्मी का साम्राज्य है, यह बात पतलू भाई को हर्षित कर देती थी। पतलू भाई थे लक्ष्मी जी के अनन्य भक्त और ये बात जगजाहिर थी तो लोग पतलू भाई को लक्ष्मी जी के दर्शन कराते और पतलू भाई आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के पर्चे के। पतलू भाई किसी भी पर्चे को बहुत ही सहजता से परीक्षा से पहले ही अपने शुभचिंतकों को और उन लोगों को जो उन्हें लक्ष्मी जी के दर्शन करा सकते थे, उपलब्ध करा दिया करते थे। पतलू भाई के पर्चे जाने कहाँ से चुपके से आते और कुछ चुनिंदा लोगों को लाभान्वित कर वैसे ही निकल जाया करते थे जैसे सरकारी राशन की दुकान से चीनी। आम लोगों को न चीनी का पता चलता न पर्चे का। एक बार मेरी मुलाक़ात ऐसे ही पतलू भाई से हो गई थी, चल पड़ी बात, मैंने पूछा- पतलू भाई आप कौन-सी परीक्षाओं के पर्चे निकलवाते हैं। पतलू भाई ने कुटिल मुस्कान चेहरे पर धारण कर गौरवान्वित होते हुए कहा- मेरे पास आइए, लक्ष्मी के दर्शन कराइए, परीक्षा का नाम बताइए, पर्चा ले जाइए।

पतलू भाई की यह बात सुनकर मेरी आँखें वैसे ही खुली रह गईं जैसे न्यायालय में चल रहे केस की फ़ाइल जो एक बार खुलती है तो बंद होने का नाम ही नहीं लेती। पतलू भाई का समाज सेवा का काम अच्छे से चल रहा था लेकिन इधर मौसम में परिवर्तन हुआ और उधर पतलू भाई के निवास स्थान में, अभी पतलू भाई से जेल में मिला जा सकता था, न जाने कैसे पतलू भाई की ये समाज सेवा वाली बात पुलिस को पता चल गई थी। पतलू भाई कहते हैं कि वो उन छात्रों की मदद कर रहे थे जिनके सपने वैसे शायद कभी पूरे न हो पाते। तो इस प्रकार से वो उन छात्रों की मदद कर रहे थे जिनको पाठय पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति लोरियाँ सुनाती थीं और फिर जो तेज़ दिमाग़ वाले हैं वो तो कभी भी कहीं भी सफलता का गीत गा सकते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि एक साथ विवेक और लक्ष्मी का वरदान विरलों को ही मिलता है। वर्तमान समय में जिसके पास विवेक है उसके सफल होने की संभावना है और जिसके पास लक्ष्मी है उसकी सफलता निश्चित है। पतलू भाई सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास करते थे और अपना काम करते-करते पाँच दस लाख जो भी बन जाया करते उसी में रुखा-सूखा खाकर वो अपना गुज़ारा कर लिया करते थे।

पतलू भाई को जेल में आए हुए दस महीने बीत चुके थे और वो जेल की सुविधाओं का भरपूर आनंद उठा रहे थे। इधर स्थानीय अख़बारों में एक ख़बर मोटे-मोटे अक्षरों में छपी थी, एक बार फिर मेडिकल परीक्षा का पर्चा आउट।

पतलू भाई जेल में बैठ कर गर्व का अनुभव कर रहे थे और ये सोंचकर उनकी आँखें नम हो गई थीं कि कोई है जो उनके अधूरे सपने को पूरा कर रहा है। मैं और मेरे जैसे कुछ लोग जो एक पतलू भाई के गिरफ़्तार होने से खुश थे वो अनेक पतलू भाइयों को उदित होते देख सोंच रहे थे कि शायद सच में ये युग पतलू भाई और उनके समर्थकों का है और इसमें तंग जेब वाले पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को सफल होने का कोई अधिकार नहीं है। मुंशी जी ने गोदान में बिल्कुल सही लिखा था, हमें संसार में रहना है तो धन की उपासना करनी पड़ेगी, इसी से लोक परलोक में कल्याण होगा। पतलू भाई का अगला लक्ष्य नेता बनकर समाज की सेवा करना है।

बर्ड फ्लू अमर रहे

मुर्गी कुड़्कुड़ाई, मुर्गे चिल्लाने लगे

मुर्गों के जुकाम से प्रशासन में बुखार के

लक्षण नजर आने लगे 

मुर्गे पकड़ने में जुटे अधिकारी

गए बाकी सब भूल

मुर्गे पकड़ते पकड़ते पहुंचे एक स्कूल 

स्कूल से दस मुर्गे पकड़ अधिकारियों के

सीने तने हुए थे

बाद में पता चला थे तीन असली मुर्गे और सात बच्चे

जो उस समय मुर्गा बने हुए थे 

यह देख प्रशासन ने जारी किया फरमान

 बर्ड फ्लू रहने तक

 बच्चों को मुर्गा बनाने का हुआ ऐलान

 शिक्षकों ने दिया एक दूजे को ढांढस

 अपना दर्द बांटा

बिन मुर्गे मुर्गियों के कक्षा में

 लगने लगा सन्नाटा 

शिक्षकों को आशा है कि वो

जल्दी ही फिर जादूगर बन जाएंगे

फिर कक्षा में भोर होगी

फिर मुर्गे कुड़कुड़ाएंगे 

इधर सुना है कि छोटे छोटे बच्चे

बड़ी बड़ी संख्याओं में मन्दिर जा रहे हैं

कभी खत्म हो बर्ड फ्लू

मन्नत मान प्रसाद चढ़ा रहे हैं 

धूम्रपान

धूम्रपान एक कार्य महान
सिगरेट है संजीवनी
पीकर स्वास्थय बनाओ
समय से पहले बूढ़े होकर
रियायतों का लाभ उठाओ

दूध और फल खाकर
हरगोपाल बनते हैं
हैरी और माइकल तो
सिगरेट पीकर निकलते हैं

जो नहीं पीते उन्हें
इस सुख से अवगत कराओ
बस में रेल में सार्वजनिक स्थलों पर
सिगरेट सुलगाओ

अगर पैसे कम हैं
फिर भी काम चला लो
जरूरी नहीं है सिगरेट
कभी कभी बीड़ी सुलगा लो

बीड़ी सफलता की सीढ़ी
इस पर चढ़ते चले जाओ
मेहनत की कमाई
सही काम में लगाओ

जो हड्डियां गलाते हैं
वो तपस्वी कहलाते हैं
ऐ कलयुग के दधीचि
हड्डियों के साथ करो
फेफड़े और गुर्दे भी कुर्बान
क्योंकि…
धूम्रपान एक कार्य महान